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श्री दुर्गा चालीसा

Shri Durga Chalisa · Devidas

माँ दुर्गा की स्तुति — चालीस चौपाइयाँ और अंत में रचनाकार के नाम वाली एक चौपाई। नीचे पूरा पाठ बड़े, साफ़ अक्षरों में है। भाषा चुनकर इसे अंग्रेज़ी, मराठी, गुजराती, बंगाली या ओड़िया में भी पढ़ सकते हैं।

चौपाई

  1. 1

    नमो नमो दुर्गे सुख करनी।नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥

  2. 2

    निरंकार है ज्योति तुम्हारी।तिहूँ लोक फैली उजियारी॥

  3. 3

    शशि ललाट मुख महाविशाला।नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥

  4. 4

    रूप मातु को अधिक सुहावे।दरश करत जन अति सुख पावे॥

  5. 5

    तुम संसार शक्ति लै कीना।पालन हेतु अन्न धन दीना॥

  6. 6

    अन्नपूर्णा हुई जग पाला।तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥

  7. 7

    प्रलयकाल सब नाशन हारी।तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

  8. 8

    शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

  9. 9

    रूप सरस्वती को तुम धारा।दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥

  10. 10

    धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।परगट भई फाड़कर खम्बा॥

  11. 11

    रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥

  12. 12

    लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।श्री नारायण अंग समाहीं॥

  13. 13

    क्षीरसिन्धु में करत विलासा।दयासिन्धु दीजै मन आसा॥

  14. 14

    हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।महिमा अमित न जात बखानी॥

  15. 15

    मातंगी अरु धूमावति माता।भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

  16. 16

    श्री भैरव तारा जग तारिणी।छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

  17. 17

    केहरि वाहन सोह भवानी।लांगुर वीर चलत अगवानी॥

  18. 18

    कर में खप्पर खड्ग विराजै।जाको देख काल डर भाजै॥

  19. 19

    सोहै अस्त्र और त्रिशूला।जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

  20. 20

    नगरकोट में तुम्हीं विराजत।तिहूँ लोक में डंका बाजत॥

  21. 21

    शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।रक्तबीज शंखन संहारे॥

  22. 22

    महिषासुर नृप अति अभिमानी।जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

  23. 23

    रूप कराल कालिका धारा।सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

  24. 24

    परी गाढ़ सन्तन पर जब जब।भई सहाय मातु तुम तब तब॥

  25. 25

    अमरपुरी अरु बासव लोका।तब महिमा सब रहें अशोका॥

  26. 26

    ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

  27. 27

    प्रेम भक्ति से जो यश गावें।दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

  28. 28

    ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

  29. 29

    जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

  30. 30

    शंकर आचारज तप कीनो।काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

  31. 31

    निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

  32. 32

    शक्ति रूप को मरम न पायो।शक्ति गई तब मन पछितायो॥

  33. 33

    शरणागत हुई कीर्ति बखानी।जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

  34. 34

    भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

  35. 35

    मोको मातु कष्ट अति घेरो।तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥

  36. 36

    आशा तृष्णा निपट सतावें।मोह मदादिक सब बिनशावें॥

  37. 37

    शत्रु नाश कीजै महारानी।सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥

  38. 38

    करो कृपा हे मातु दयाला।ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला॥

  39. 39

    जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ।तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥

  40. 40

    दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।सब सुख भोग परमपद पावै॥

  41. 41

    देवीदास शरण निज जानी।करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

अतिरिक्त पद

  1. शरणागत रक्षा करे, भक्त रहे निःशंक।मैं आया तेरी शरण में, मातु लीजिये अंक॥

पाठ गिनती

हर पूरे पाठ के बाद बटन दबाएँ। गिनती इसी फ़ोन/कंप्यूटर पर सहेजी रहती है।

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दुर्गा चालीसा क्या है?

दुर्गा चालीसा माँ दुर्गा की स्तुति है, जिसमें देवी के अनेक रूपों, उनके पराक्रम और भक्तों पर उनकी कृपा का वर्णन है। इसकी भाषा अवधी और ब्रज से मिलती-जुलती हिंदी है। अंतिम चौपाई में रचनाकार का नाम आता है — ‘देवीदास शरण निज जानी’ — इसलिए इसे देवीदास की रचना माना जाता है।

प्रचलित पाठ में चालीस चौपाइयाँ हैं और अंत में देवीदास के नाम वाली एक और चौपाई। कुछ संग्रहों में इसके बाद एक दोहा भी मिलता है — ‘शरणागत रक्षा करे, भक्त रहे निःशंक’। यह दोहा अधिकतर स्रोतों में नहीं है, इसलिए इसे अलग से ‘अतिरिक्त दोहा’ के रूप में दिया गया है।

चालीसा में देवी के रूप और कथाएँ

चालीसा देवी को अन्नपूर्णा, गौरी, सरस्वती और लक्ष्मी के रूप में याद करती है, और दस महाविद्याओं में से मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी, बगला, भैरवी, तारा और छिन्नमस्ता का नाम लेती है। हिंगलाज, नगरकोट (काँगड़ा) और ज्वाला (ज्वालामुखी) जैसे शक्तिपीठों का भी उल्लेख है।

इसके बाद देवी के पराक्रम की कथाएँ हैं: शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज का संहार, और महिषासुर का वध, जिसके पाप के भार से धरती व्याकुल थी। चालीसा यह प्रसंग भी कहती है कि शंकराचार्य ने शिव का ध्यान तो किया पर शक्ति को नहीं जाना; शक्ति चली गई तो पछताए, देवी की शरण ली, और जगदम्बा ने बिना देर किए उन्हें फिर शक्ति दी।

दुर्गा चालीसा का पाठ कैसे करें

  • स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें और माँ दुर्गा के चित्र या मूर्ति के सामने बैठें।
  • घी का दीपक जलाएँ; लाल फूल (गुड़हल), लाल चुनरी, रोली और अक्षत अर्पित करें।
  • पहली चौपाई से अंतिम चौपाई तक पूरा पाठ एक ही बैठक में करें।
  • पाठ के बाद माँ की आरती ‘जय अम्बे गौरी’ गाएँ और प्रसाद बाँटें।

कब और कितनी बार पढ़ें

चैत्र और शारदीय नवरात्रि के नौ दिन दुर्गा चालीसा के पाठ के सबसे प्रमुख दिन हैं; बहुत-से परिवार घटस्थापना से नवमी तक रोज़ सुबह-शाम इसका पाठ करते हैं। शुक्रवार और हर महीने की अष्टमी भी देवी के दिन माने जाते हैं।

रोज़ एक बार का पाठ पर्याप्त है। संकल्प के रूप में लोग 11, 21 या 108 पाठ भी करते हैं; गिनती के लिए ऊपर दी गई पाठ गिनती का उपयोग करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा चालीसा किसने लिखी?

अंतिम चौपाई में नाम आता है: ‘देवीदास शरण निज जानी’। इसलिए इसे देवीदास की रचना माना जाता है। उनके जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।

दुर्गा चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

चालीस चौपाइयाँ, और अंत में रचनाकार देवीदास के नाम वाली एक चौपाई — कुल इकतालीस। कुछ संग्रहों में अंत में एक दोहा भी जोड़ा जाता है।

दुर्गा चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

कभी भी, सुबह या शाम। नवरात्रि के नौ दिन, शुक्रवार और अष्टमी को इसका विशेष महत्व माना जाता है।

दुर्गा चालीसा कितनी बार पढ़नी चाहिए?

एक बार का पूरा पाठ पर्याप्त है। संकल्प लेकर लोग 11, 21 या 108 पाठ भी करते हैं।

क्या दुर्गा चालीसा रोज़ पढ़ सकते हैं?

हाँ। रोज़ एक ही समय पर, शांत मन से एक पाठ करना सबसे सरल नियम है।

दुर्गा चालीसा पढ़ने से क्या लाभ होता है?

भक्तों की मान्यता है कि इससे भय और संकट दूर होते हैं और मन को बल मिलता है। चालीसा स्वयं कहती है: ‘प्रेम भक्ति से जो यश गावें, दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें’। यह आस्था का विषय है।

नवरात्रि में दुर्गा चालीसा कैसे पढ़ें?

घटस्थापना के बाद नौ दिन रोज़ सुबह और शाम माँ के सामने दीपक जलाकर पूरा पाठ करें और उसके बाद ‘जय अम्बे गौरी’ आरती गाएँ। अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन के साथ समापन करें।

चालीसा में ‘हिरण्याक्ष’ क्यों लिखा है, जबकि प्रह्लाद की कथा हिरण्यकशिपु की है?

नरसिंह वाली चौपाई में अधिकतर प्रकाशित पाठों में ‘हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो’ है, इसलिए हमने वही रखा है। कथा के अनुसार नरसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध किया था; हिरण्याक्ष उसका भाई था। कुछ संस्करण यहाँ ‘हिरणाकुश’ पढ़ते हैं।

दुर्गा चालीसा के बाद क्या करें?

पाठ के बाद माँ की आरती ‘जय अम्बे गौरी’ गाएँ और प्रसाद बाँटें।

क्या दुर्गा चालीसा बंगाली या दूसरी लिपि में पढ़ सकते हैं?

हाँ। भाषा सूची में English, मराठी, गुजराती, বাংলা या ଓଡ଼ିଆ चुनें। शब्द वही रहते हैं, केवल लिपि बदलती है, और आप जिस चौपाई पर थे वहीं पहुँचते हैं।

यह पाठ कई प्रकाशित स्रोतों से शब्दशः मिलाकर जाँचा गया है। कोई त्रुटि दिखे तो हमें बताएँ।