श्री गणेश जी की आरती
Shri Ganesh Ji Ki Aarti
‘जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा’ — गणेश जी की सबसे प्रचलित आरती, जो हर पूजा के अंत में गाई जाती है। नीचे पूरी आरती बड़े, साफ़ अक्षरों में है; हर पद के बाद टेक दोहराई गई है, जैसे यह गाई जाती है।
आरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
- 1
एक दंत दयावंत चार भुजा धारी।माथे सिंदूर सोहे मूसे की सवारी॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
- 2
पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवा।लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
- 3
अंधन को आँख देत कोढ़िन को काया।बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
- 4
'सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा।माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
अतिरिक्त पद
दीनन की लाज रखो शंभु सुतकारी।कामना को पूर्ण करो जाऊँ बलिहारी॥
यह भी पढ़ें
गणेश जी की आरती के बारे में
‘जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा’ गणेश जी की सबसे प्रचलित हिंदी आरती है, जो लगभग हर पूजा और शुभ अवसर के अंत में गाई जाती है। इसमें गणेश जी के रूप का वर्णन है — एक दाँत, चार भुजाएँ, माथे पर सिंदूर और मूषक की सवारी — और उनकी कृपा की महिमा।
आरती की एक पंक्ति में ‘सूर श्याम’ आता है, जिसे संत सूरदास की छाप माना जाता है; इसलिए यह आरती सूरदास जी की रचना मानी जाती है। हर पद के बाद टेक ‘जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा’ दोहराई जाती है। अंत का ‘दीनन की लाज रखो’ पद कई संग्रहों में अतिरिक्त पद के रूप में मिलता है।
गणेश जी की आरती कैसे करें
- पहले पूजा या गणेश चालीसा का पाठ पूरा करें; आरती पूजा के अंत में की जाती है।
- थाली में घी का दीपक या कपूर जलाएँ; साथ में दूर्वा, लाल फूल और मोदक या लड्डू रखें।
- थाली को घड़ी की सुई की दिशा में घुमाते हुए आरती गाएँ।
- आरती के बाद दीपक की लौ पर दोनों हाथ घुमाकर आँखों से लगाएँ और प्रसाद बाँटें।
आरती की थाली कितनी बार घुमाएँ
परंपरा में प्रचलित क्रम है: भगवान के चरणों की ओर चार बार, नाभि की ओर दो बार, मुख की ओर एक बार, और फिर पूरे विग्रह के सामने सात बार आरती घुमाई जाती है। अलग-अलग परिवारों में यह क्रम थोड़ा अलग भी हो सकता है; भाव सबसे महत्वपूर्ण है।
आरती कब करें
गणेश जी की आरती रोज़ सुबह-शाम की पूजा के अंत में, और किसी भी शुभ काम, गृह-प्रवेश या त्योहार की पूजा में की जाती है। बुधवार गणेश जी का दिन माना जाता है, और गणेशोत्सव के दस दिनों में सुबह-शाम आरती की परंपरा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गणेश जी की आरती किसने लिखी?
आरती की एक पंक्ति में ‘सूर श्याम’ आता है, जिसे संत सूरदास की छाप माना जाता है। इसलिए यह आरती सूरदास जी की रचना मानी जाती है।
गणेश जी की आरती कब करनी चाहिए?
रोज़ सुबह-शाम पूजा के अंत में, और हर शुभ काम, गृह-प्रवेश या त्योहार की पूजा में। गणेशोत्सव के दस दिनों में सुबह-शाम आरती की परंपरा है।
आरती की थाली कितनी बार घुमानी चाहिए?
प्रचलित परंपरा के अनुसार चरणों की ओर चार बार, नाभि की ओर दो बार, मुख की ओर एक बार, और फिर पूरे विग्रह के सामने सात बार।
गणेश जी की आरती में क्या चढ़ाएँ?
दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर और मोदक या लड्डू। आरती में भी इन्हीं का उल्लेख है: ‘पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवा, लड्डुअन का भोग लगे’।
‘दीनन की लाज रखो’ वाला पद अलग क्यों दिया है?
यह पद हर जगह नहीं गाया जाता; कई संग्रहों में इसे अतिरिक्त पद के रूप में दिया जाता है। जहाँ गाया जाता है, वहाँ इसे अंत में या ‘सूर श्याम’ वाली पंक्ति से पहले गाते हैं।
क्या गणेश चालीसा के बाद आरती करनी चाहिए?
हाँ, परंपरा में पूजा या पाठ का समापन आरती से होता है। पहले गणेश चालीसा पढ़ें, फिर यह आरती गाएँ।
‘एक दंत दयावंत’ का अर्थ क्या है?
एक दाँत वाले और दया करने वाले। गणेश जी का एक नाम ‘एकदंत’ भी है।
क्या यह आरती English या दूसरी लिपि में पढ़ सकते हैं?
हाँ। भाषा सूची में English, मराठी, गुजराती, बंगाली या ओड़िया चुनें। शब्द वही रहते हैं, केवल लिपि बदलती है।
यह पाठ कई प्रकाशित स्रोतों से शब्दशः मिलाकर जाँचा गया है। कोई त्रुटि दिखे तो हमें बताएँ।